Sunday, 17 February 2019

जय हिन्द

जय हिन्द


पुलवामा में शहीद हुए मेरे देश के वीरों की शहादत पर नतमस्तक होने की बजाय, भारत में रहते हुए जिसने भी इसका मुस्कान से स्वागत किया, केक काटकर जश्न मनाया, बदला पूरा होने का नारा लगाया, दुश्मन को सही ठहराया या फिर शांति से वार्ता का प्रस्ताव दोहराया, आज उन देशद्रोहियों को सबसे पहले सबक सिखाने की जरुरत है| सबक भी ऐसा की पुश्तें  तक देशप्रेम के मायने सीख जायें| जब मेरे ही देश का वासी ये कहता है की फौजी तो मरता ही है तब आभास होता है की दुश्मन का दमन तो अंदर से करने की जरुरत है| इस अंदर बैठे दुश्मन ने जो खौफ रचाया है, उस पर वार करना चाहिए, आज सबको मिलकर प्रहार करना चाहिए....



सिंह सी दहाड़ पर दुश्मन की चित्कार हो, अंत अब इन्तजार हो...
हो खौफ पर प्रहार हो, हो खौफ पर प्रहार हो…

बैरी घर में छुपा हुआ, हम में ही है मिला हुआ..
ढूंढ ढूंढ उस पर वार हो, चाहे नर हो या नार हो....

व्याकुल सत्ता को तड़प रहे, अंधे लोलुप भटक रहे..
इनकी साजिशों की धार पर खुद उनका परिवार हो,
तो विच्छन्न यह व्यापार हो…

जो शांति और वार्ता का पाठ हमें पढ़ा रहे,
वीरों की शहादत का जो जश्न हैं मना रहे, धरपकड़ सबकी इस बार हो
तो गफलत का उपचार हो…

शहीदों की विदाई पर जिस आँख में नमी नहीं, न जिस दिल में हाहाकार है..
देशद्रोही वो खोजा जाये, आतंकी वो कहलाये...
वो ना मेरे देश का हक़दार हो, न उसे जीने का अधिकार हो…

हर उस उदंडी का प्रतिकार हो, यह भाव प्रचंड विस्तार हो...
अब आर हो या पार हो पर खौफ पर प्रहार हो,
हो पर खौफ पर प्रहार हो |



Tuesday, 8 January 2019

मेरे प्यारे चाचाजी


मेरे चाचाजी चले गए, बहुत दूर, इतना कि जहाँ से कोई वापस नहीं आ सकता, कभी भी नहीं! कुछ आता है तो केवल यादें! जो कभी नही जाती, कहीं नहीं जाती!  चाचाजी उम्र से बहुत पहले चले गए, हम तो विश्वास ही नहीं कर पाए न ही स्वीकार कर सके हैं, आज तक! ईश्वर कि इच्छा, उसकी रचना कोई भी तो नहीं जान सकता, सो हम भी नहीं जान सके! जान पाए तो बस यही कि ईश्वर भी क्रूर होता है, अप्रिय हो जाता है कभी कभी!  हर त्यौहार, जीमण, मेल-मिलाप, खाने का स्वाद..और भी न जाने कितनी ही जीवन की उमंगें और जीवन के  रस....सब नीरस हो गए चाचाजी के जाने के बाद! सभी अनुभूतियों को तो भूमिका में लिखा नहीं जा सकता....बस यही कहूँगी की बहुत याद आती है चाचाजी की...उन्ही को याद कर रही है यह मेरी पंक्ति….











मेरे प्यारे चाचाजी

इस विशाल वट के सिंचन-तंत्र थे..
तुम हंसी ख़ुशी के सिद्ध मंत्र थे!

वो उत्तास, साहस के  वृतांत पठित हैं..
तुम्हारी सरल बुद्धि के निशां अमिट हैं!

भ्रातृ-भक्ति की मिसाल छोड़ गए,
कितने किस्से-कहानी कमाल छोड़ गए!

कहाँ खोये हो, कहाँ जा कर लीन हुए …
आखिर क्यों इतने तल्लीन हुए !


अब दिवाली अंधियार हो गई,
 होली भी खुशहाल न रही!

सब तीज त्यौहार बदरंग हुए,
तब संयुक्त थे, अब भंग हुए!

न पकवानो में स्वाद रहा,
न  मनुहारों का प्रयास रहा!

सबकुछ नीरस अनमना है,
तुम बिन जीवन सूना घना है!

चाचाजी मेरे प्यारे प्यारे…

क्यूँकर इतनी दूर गए हो,
दिखते नहीं, क्या रूठ गए हो!

जाना तुम्हारा मंजूर नहीं है,
गलत है की ईश्वर क्रूर नहीं है!

आ जाओ न, यूँ तस्वीर न बनो,
झपको ना पलकें, यूँ पीर न बनो!!





Thursday, 3 January 2019

नानीजी

वर्ष 2019 के आते ही घर की बुजुर्ग पीढ़ी की जमात का आखिरी सदस्य शांत हो गया| नानी सास के रूप में मिले एक प्यारे से रिश्ते ने वर्ष के अंतिम दिन, अंतिम सांस ली| उनके आदर्शों और प्रेरणाओं का स्मरण करते हुए श्रद्धांजली देती हुई यह मेरी पंक्ति....








अधर सुसज्जित सदा रहे, सुंदर सरल मुस्कान से …
प्रेम, समर्पण, पर-उपकार, सदा जीवन के अभिमान थे!!

जप-तप, जब तब व्रत-उपवास, 
श्रम, नियम और दान उल्लास...
जन्म को ही उपादान मिले!!

ममता, नम्रता से प्रतत हो, 
आदर्श स्मृति में अंक गए…

'नानी', व्यक्तित्व वृहद तुम्हारा, इक गुण का ही वरदान मिले,
सफल श्वास सब हो जाये, चिंतन को नव प्राण मिले!!

मन, वचन और श्रद्धा से, कर नमन यह मांग रहे..
हे ईश!!
जीवन जीवट जो पूर्ण हुआ, 
उसे परलोक में भी मान मिले,
चिरशांति, मोक्ष प्रतिदान मिले!!

Thursday, 10 August 2017


कारे बदरा



घनघोर काली घटायें और रिमझिम बरसते मेघ किसी के भी मन को रोमांचित कर देते हैं...खासकर तब जब की लम्बी प्रतीक्षा के बाद इन्हे देखने का अवसर मिलता हो| कल से ऐसे ही सुहाने मौसम से  मन प्रफुल्लित और तरोताज़ा है...और हर बरसती फुहार के साथ साथ, कुछ समय पहले लिखी हुई पंक्तियाँ भी स्वतः ही मुख से गीत बनकर निकल रही हैं| अपनी यह उमंग आपसे साझा कर रही हूँ..माध्यम है यह मेरी यह पंक्ति...










कारे कारे, प्यारे बदरा, क्यों देर से आये रे...
रिमझिम करती बूंदों को थे क्यों हमसे छिपाये रे...

तकती राह कितनी अँखियाँ थीं,
चिंतित मन में बतियाँ थीं,
खग-विहग, ताल-तलैया, 
सबकी बेचैन रतियाँ थीं||

जो आये अब तो ऐसे आये, मयूर मन ये बन जाये रे,
तेरी ठंडी ठंडी पवन के झोंके, मेरा रोम-रोम हर्षाये रे ||

कारे कारे, प्यारे बदरा, क्यों देर से आये रे...
रिमझिम करती बूंदों को थे क्यों हमसे छिपाये रे..

जो आये अब तो जाना मत तुम
दौलत अपनी कर दो न अर्पण,
टिको, रहो, ले लो तो कुछ दम,
तृप्त कर दो न सृष्टि का हर कण ||

तेरी नन्ही नन्ही फुहार की कलियाँ,
सौंधी सुगंध उड़ाए रे...
मन का पंछी चहकता उड़ता,
जब सब गुलशन बन जाये रे...
कारे कारे प्यारे बदरा, क्यों देर से आये रे||


Thursday, 30 March 2017

मुस्कान तेरी


एक दूसरे से बंधे-गुंथे हुए हम भाई-बहन बचपन की दहलीज़ पार करके कब, कितना आगे निकल आये पता ही नहीं चला| एहसास इस बात का तब हुआ जब अपने बच्चों को भी उसी दौर को दोहराते देखा| एक दूसरे के बच्चों के साथ नए बनते रिश्ते और उन रिश्तों में नई अनुभूतियाँ स्पंदित होते दिखीं| जनम लेने से पहले से ही उस आने वाले मेहमान के रूप में नया रिश्ता, नया एहसास लाता है | जनम के साथ ही उसके आने का जश्न , नामकरण पर चर्चा, नैन नक्शों से ख़ुद के मिलान की  लुभावनी ज़िद, एक अनूठा, प्यारा सा  जुड़ाव पैदा कर देती है | यही तो रिश्तों की मिठास होती है | 'बुआ' और 'मासी' के ये रिश्ते कितने अद्भुत होते हैं न| आज मन किया कि क्यों न इन कोमल नन्हे रिश्तों के अनुभव को पंक्तिबद्ध करूँ|

अपने छोटे भाई के नन्हे-मुन्ने का हर वक्त मुस्कुराता चेहरा आँखों के सामने आ रहा है| परेशानी में भी तुरंत मुस्कुरा देना उसकी ऐसी विशेषता है की घर के बड़ों को कभी किसी भी गलती पर उसपर नाराज़ नहीं होने देती| यही खासियत उसका आकर्षण है|
उसी मासूम के नाम आज स्नेहाशीष से भरी यह मेरी पंक्ति.....

मुस्कान तेरी







यह मुस्कान तेरी संजीवन है,
कितने रिश्तों का यह जीवन है..

कभी खज़ाना ना खाली हो,
ना कभी इसकी कंगाली हो..

प्रेम की समृद्धि मिलेगी,
खूब लुटाना, खूब जुटाना..

राम सी श्रद्धा पाए तू,
श्रवण की सेवा भी लाना..

कृष्ण की चंचलता से,
सबके मन को खूब रिझाना..

आर्यभट्ट की सूक्ष्मता तो,
कलाम की सज्जनता पाना..

भर-भर  है ये आशीष तुझे,
सदा खुशियों से संपन्न रहे..

सर्वोत्तम सर्वप्रिय बनके,
ह्रदय में सबके बस जाना..

मन वाणी की मृदुता से,
"रेयांश" तू सार्थक बनाना!!!

Wednesday, 21 September 2016

नाज़ है तुझ पर ...

अपनी अति प्रिय के एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चयन की खबर से आज सुबह की आँख खुली| उसकी ख़ुशी शब्दों में बंध ही नहीं पा रही थी| याद हो आया मुझे की एक छोटे से इलाके से निकली इस बच्ची ने विकसित दुनिया का हिस्सा बनने की कभी कल्पना भी न की थी| उसकी आँखों में झिलमिलाते सपने को पहचानकर, थोड़ा उसका हाथ थामकर, इन सपनो को हासिल करने की राह दिखाई तो उसने पूरी मजबूती और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ इस राह पर अपने सफर की शुरुआत की| न तो लोगों के कटाक्षों से डगमगाई और न ही राह के अन्य काँटों की चुभन की परवाह की| आज उसके मंजिल नज़र आने की खबर से खुश हूँ बहुत| संतुष्ट और गौरवान्वित हूँ उसके परिश्रम से, आशान्वित हूँ उसकी अनेक बुलंदियों के लिए और साथ ही उसके सफर में थोड़ी देर का साथी बनने का सुख भी अनुभव कर रही हूँ|
रिश्ते में ननद पर ह्रदय में अपने ही अंश का सा अहसास देने वाली इस बच्ची को शुभाशीष व शुभकामनाओं सहित समर्पित कर रही हूँ मेरी यह पंक्ति...







चाँद-सितारों की चमचम से पथ रोशन है,
आगाज़ कर...तू नव आगाज़ कर..

ले भर बाँहों में अनंत, हर हवा का अंदाज़ कर,
अब नित् नव आभास कर...

फैला पंख ले निर्भयता से, बेहद ऊंचा परवाज़ भर,
नित् नव शिखर पर वास कर...

अथक कारज के मकरंद को, अब चाव से तू स्वाद कर...
इस नव सुधा का स्वाद विलग...

मौनी निंदक भये तो, मस्तक प्रियजन के खड़े,
आज तुझपर नाज़ सबको, इस नाज़ के अहसास पर...
राज कर तू आज कर...

उछाह मन की सुखद बड़ी है, इस उछाह से हो ले तर,
निशंक हो न लाज़ कर,
ह्रदय की आवाज़ पर....
ले कर नव आगाज़ कर!!!!








































Thursday, 11 February 2016

वीर

विस्मित हुई भूमिका आज दुखी है, मौन है... मौन के साथ शहीद हनुमनथप्पा को श्रद्धांजलि देती मेरी यह पंक्ति...

वीर





लिया आसमां ने बुला तुझको,
थी वसुधा की भी चाह यही....
चला वीर वो हुआ विदा,
नई वीरता की मिसाल रचा...

भारती का तिलक बन,
मस्तक पर दिया ओज सजा...
परलोक में भी बनी रहे,
यही वीरता यही अडिगता..

अमर रहेगा तू सदा...
तेरा गिरी, न गिर, कुछ बिगाड़ सका..
तेरी शहादत को नमन बाँकुरे,
तेरे प्रण को वंदन सदा सदा!!!

Monday, 9 November 2015

बाबा

अल्प में भी असीमित की संतुष्टि, विपन्नता में भी सम्पन्नता का अहसास,  हर स्थिति में प्रसन्न रहने की विलक्षणता कहाँ से ढूंढ लेते थे आप 'बाबा' !
सागर की तरह विशद सकारात्मकता और अद्भुत आशावाद आज कितना दुर्लभ हो गया है परन्तु आपका तो पूरा व्यक्तित्व ही जैसे इन्ही तत्वों का बना हुआ था| बड़ा ही भाग्यशाली पाती हूँ स्वयं को की दादा श्वसुर के रूप में आपका स्नेह और आशीर्वाद पा सकी मै!
अगर आपके गुणों का अंश मात्र भी अपनी संतति में पा सकी तो धन्य हो जायेगा उनका जीवन और सफल हो जाएगी मेरी परवरिश !

शत शत नमन करते हुए, खुद को समर्पित करती, मेरी पंक्ति...








संपूर्ण, समृद्ध, संपन्न थे...
सकल  विश्वास से धन धन थे...

प्रेरणा दायी दृष्टि का,
हर कोण दिखाया था तुमने...
धन्य ये जीवन हुआ,
तुमसा छत्र जो पाया था हमने...

वंदन, नमन, स्मरण से,
तुमको आज पुकार रहे...
रोम रोम की श्रद्धा से,
पग आज पखार रहे...

अपने गुणों का अंश ही,
आशीष में प्रदान करो...
सदा ह्रदय पट पर बस,
"बाबा", पथ प्रकाशवान करो!!


Sunday, 18 October 2015

रानी बिटिया



पढ़ा था शायद कहीं, 'तपती धूप में पानी की फुहार सी होती हैं बेटिया'| दो अनमोल चिरागों से रोशन यह जीवन इस फुहार की ठंडक के अनुभव को तलाशता ही रहा है| एक बरस पूर्व, जब छोटी बहन की इस नवजात को पहली बार गोद में उठाया तो उस अनोखी अनुभूति की सुंदरता, नाजुकता, और भावुकता अंदर आ बसी| अब परदेस में बड़ी हो रही इस बिटिया को तस्वीरों में खिलखिलाते, मुस्कुराते भिन्न अंदाज़ों में देखती हूँ तो अंदर बसा हुआ यह आभास और भी धड़कने लगता है....
यह शायद ममता का अंश ही हो जो अठखेलियां करती इस बेटी को देख उतर गया इन पंक्तियों में.....





कितनी सारी बतियाँ करती,
बतियाँ करती अच्छी लगती ...

जैसे सुन्दर सी सुना रही कहानी,
देखो रानी बिटिया हो रही सयानी...

नज़र का काला टीका लगा दो,
 "माँ", इसे कहीं छुपा दो...

देख इसे मन हर्षाये,
न मेरी नज़र ही लग जाये...

राह तकती थकी अँखियों को,
आकर शीतल कर दे बिटिया
दादी नानी की बगिया को
महक चहक से भर दे चिड़िया 

दूर रहकर क्यों तरसा रही,
 ये गोद तुझे है बुला रही...
अब , देर ना कर, उड़ के आजा 

कितनी लोरी हैं तुझे सुनानी...
रानी बिटिया हो रही सयानी!!!!

Wednesday, 7 October 2015

चुनावी मौसम (1)

एक समाचार पर नज़र जाते ही मन को बड़ी पीड़ा हुई आज| देश के महत्वपूर्ण प्रदेश में चुनाव होने को हैं| हर बार की तरह चुनाव के पूर्व वायदों से एक स्वप्निल सा वातावरण, राजनीतिक दलों द्वारा बनाया जाता रहा है, एक मायाजाल सा फैलाया जाता रहा है, तो आरोपों का पिटारा भी खोला जाता रहा है| पर हमारे ही एक नेता द्वारा यू.एन.ओ. को पत्र लिखकर, अपने ही देश में हस्तक्षेप की मांग करना बहुत ही अलग हो गया इस बार| बदलाव इस रूप में, निसंदेह ही सुखद नहीं है|

मुझे याद हो आई बाईस बरस पूर्व की वह बात, जब ऐसे ही चुनावी मौसम में किसी दल के नेता ने, चुनाव प्रचार के दौरान सूखाग्रस्त क्षेत्र में बारिश करने का वायदा कर डाला था| हँसते हुए मन से निकलकर कुछ पंक्तियाँ कागज़ पर मुस्कुरा गई थीं तब| जब तुलना की तो अतिश्योक्ति इस पुराने  रूप में, आज बुरी नहीं लगी|
सन्दर्भ तो भिन्न है परन्तु तनाव व पीड़ा के कष्ट में इन पंक्तियों का स्मरण आज भी मुस्कान दे गया तो सोचा क्यों न यह मुस्कान आपसे भी बाँट लूँ| उस वक्त ऐसे ही चुनावों के दौरान बने वातावरण में  मेरे 17-18 वर्षीय युवा मन ने अभिव्यक्त की थीं, मेरी यह पंक्ति...







चुनावी मौसम


पधारे नेताजी गांव अचानक ,
खबर यूँ फैली चारों ओर  ...
लगी हो जंगल में आग भयानक..

बच्चे, बूढ़े और पठ्ठे,
हुए पंचायत में इकठ्ठे...
बोले..
अब आये हो, क्या चुनाव साथ लाये हो?

अंदर से खिसियाते हुए,
पर ऊपर से मुस्कुराते हुए,
हो नम्रतम नेताजी बोले...
न हमसे कुछ भी छुपाओ,
समस्याएं अपनी हमे बताओ..
धर के उनपर अपना ध्यान,
करेंगे उनका हम समाधान...

बाबा एक बूढ़े बोले,
नल बिन मरते लोग भोले...

दिया नेताजी ने आश्वासन..
नल तो हमे लगवाना ही है...
यह तो कोई समस्या नहीं है|

हुआ पीछे से एक प्रहार,
सड़क नहीं है यहाँ सरकार|

बोले, बन रही सड़क भी भई,
कोई समस्या बताओ हमे नई|

बालक एक बोला ज्ञानी,
बरसता नहीं है यहाँ पानी...

पुलकित हो नेताजी चहके,
'औ' बाग़ बाग़ होकर महके,
बोले वे भरकर स्वांग ....
करेंगे पूरी तुम्हारी मांग...

मेघ भी हम बरसाएंगे,
जो चाहोगे करवाएंगे,
करेंगे हम तुम्हारा उद्धार..
पर,
शर्त करो हमारी स्वीकार...
कि, वोट तुम हमको ही दोगे
वरना मांगे अपनी खोवोगे |

ले लिया जब पक्का आश्वासन...
तो, डर उनके सब सफा हो गए...
ले विदा और हाथ हिला...
नेताजी बैठ कार में हवा हो गए !!

Friday, 2 October 2015

खुद संग


 खुद संग


कुछ अहसासों की भूमिका नहीं दी जाती, सिर्फ अहसास किया जाता है| आप भी करिये प्रयास अहसास करने का कि खुद से मिलकर कभी कभी कैसे दृष्टि और दृष्टिकोण पूरा ही बदल जाता है, कुछ खोया हुआ पास ही मिल जाता है तो जो निकट ही था वो भ्रम साबित हो जाता है...इसलिए खुद से मिलते रहना बड़ा जरूरी होता है| कुछ ऐसे ही अनुभव को लिए हुए है मेरी यह पंक्ति....








इतनी उलझन खुद से मिल,
न पहले कभी एहसास हुई...

कुछ शिकवे हुए, कुछ गिले हुए,
कुछ बहस मुद्दत बाद हुई...

वो लम्हा इक इक गुजर लिया,
बीते पल की जब आवाज़ हुई...

कुछ फिरी समझ क्यों नादानी में,
क्यों पावन मन से घात हुई...

लरज़ते-गरज़ते शुबहों से,
न कश्मकश तो आज़ाद हुई...

पर...
जब खुद संग बिताये कुछ कुछ पल,
जब खुद से कुछ दिन बात हुई...

तो पहचान हो आई वो हर मुस्कान,
इस उदासी से थी जो उदास हुई ||

Sunday, 7 June 2015

चुनमुन चूहा



पढ़ने पर तो हास्य कविता का सा बोध कराती हैं मेरी यह पंक्तियाँ परन्तु सत्य बताऊँ.....कुछ 4-5 वर्ष पहले घर में चूहे ने सेंध मारकर कितने ही दिन मेरे घर को अपने कब्ज़े में रखा और मेरी स्थिति ठीेक ऐसी ही हास्यास्पद कर दी थी| इसीलिए तो कलम से यह पंक्तियाँ हँसते मुस्कुराते हुए कागज़ पर उतर गई थी|

अभी मुझे किसी ने सन्देश भेजा की काफी गंभीर दिखता है मेरा व्यक्तित्व , क्यूंकि गंभीर ही लिखा है अभी तक| पर वास्तव में ऐसा तो नहीं है....यही सिद्ध करने की कोशिश में आपसे बाँट रही हूँ अपनी मुस्कान, माध्यम है ये मुस्कुराती मेरी पंक्ति......


चुनमुन चूहा 



चुनमुन चूहा बड़ा शैतान, घर में घुसता सीना तान
जो भी उसको भाता है, सबको चट कर जाता है ....
झाड़ू पकडे पीछे दौड़ाये, मम्मी को करता हैरान
चुनमुन चूहा बड़ा शैतान!!!

उसे पकड़ने पिंजरा लाये , कांटे में रोटी अटकाए...
रोटी बाहर ला चबाये, पिंजरे को ठेंगा दिखलाये...
सारी कोशिश हुई नाकाम, चुनमुन चूहा बड़ा शैतान!!

उसे मारने 'रेट किल' (rat kill) लाये,
चीनी में उसको लिपटाये
बिस्कुट सा 'रेट किल' को चबाये,
सारे पाइजन (poison) फुस्सम्फान,
चुनमुन चूहा बड़ा शैतान!!!

रोज ही करते ढेरो उपाय ,
 कैसे उससे मुक्ति पाये ...
सारे उपाए धता बताये,
मुँह बना के हमे चिड़ाए .....

हमे चिड़ा के रोज छकाए, अपने पीछे कितना भगाए
है कोई जो हमे बचाये, मुश्किल में पड़ी है  जान
चुनमुन चूहा बड़ा शैतान...





Wednesday, 29 April 2015

प्रकृति चन्दन


दरअसल, सत्य तो यह है की ये पंक्तियाँ अपने बेटे को स्कूल की एक प्रतियोगिता में, स्वयं कि लिखी कविता बुलवाने की जिद में लिखी थीं| किन्तु जब शब्दों ने कागज़ पर उतरकर यह रूप लिया तब अहसास हुआ कि चाहे कोई भी युग, समय, स्तर अथवा विचारधारा रही हो, माता पिता सदा से ही अपने बच्चों के लिए इन विशिष्ट गुणों से परिपूर्ण होने कि कामना करते आये हैं| आज माँ के रूप में मेरी कामना भी कतई  अलग नहीं थी|
अपने घर परिवार के बच्चों को समर्पित कर रही हूँ अपनी यह कामना| और हाँ, अगर इन पंक्तियों में आप भी अपने मन कि बात महसूस करें, तो समर्पित कर सकते हैं, अपनी आँख के तारों को, यह मेरी पंक्ति...




 

प्रकृति चन्दन



सूरज की गर्मी में तपकर,
चाँद सा शीतल बन जाऊँ..

ह्रदय अम्बर सा विशाल बने,
और मन में दया की बरखायें..

सागर की गहराई पाऊँ,
अटल पर्वत बन दिखलाऊं..

धरा का धीर मुझे मिले,
और चरित्र नभ सा धवल बने..

ग्रहों की मुझे गति दे दो,
और ऋतुओं का सा प्राण दो..

फूलों की सुगंध बन जाऊँ,
हर दिल हर मन महकाऊँ..

ईश सुनो मेरा यह वंदन,
हर गुण सृष्टि का कर दो अर्पण..

सरल, सुदर्शन, उज्जवल जीवन,
अंग अंग को दे दो प्रकृति चन्दन||




Thanks for reading.
Copyright - Vindhya Sharma


Wednesday, 22 April 2015

फ़िरदौस

एक मासूम, जिसने किताबों में कश्मीर को भारत का स्वर्ग पढ़ा, उसका बेहद खूबसूरत चित्रण व् तस्वीरें देखी और न जाने कितनी ही बार घर में, उस सपनो से सुन्दर शहर को घूमने और जाकर देखने की जिद की| फिर उसने जब उस सपनो के शहर के लहूलुहान होने, हिंसा से त्रस्त होने, रोज ही अनेक हत्याओं के अर्थात  भीषण आतंकवाद का निर्ममता पूर्वक शिकार होने के बारे सुना, पढ़ा और टीवी पर देखा तो वो डर के मारे कांप गई| 
२५-३० वर्ष पूर्व के कश्मीर के दयनीय व् मन को व्यथित कर देने वाले हालात किसी से छुपे नहीं हैं| उन हालातों का, मेरे १४-१५ बरस के मासूम मन पर जो प्रभाव पड़ा वो कागज़ पर पंक्तियों के रूप में उतर आया... इन दिनों जब कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा लहराने, पाकिस्तान समर्थन में नारे लगाने, आतंकवाद व् हिंसा को उकसाने की ख़बरें पढ़ी तो, उन पंक्तियों को आपसे बाँटने का मन हो आया, जो हैं तो बचपन की कलम से लिखी, पर सच 
भी तो हैं...


फ़िरदौस 


कह फ़िरदौस गए जाने वाले जिसे,
नरक भी लगे अब कहना कठिन उसे..

जगह सुकून की तन्हाई ने ली,
बहार की जगह ललाई ने ली ...

शांति जहाँ अशांत हो गई है,
हंसी वहां खुद रो गई है...

डरती मौत है जहाँ जिंदगी से,
उठे है आस्था वहां बंदगी से...

हा !! कश्मीर वो सुन्दर कहाँ खो गया,
धैर्य भी अब अधीर हो गया ...

बुरी लगी ऐसी है नज़र उसे,
जो नरक भी लगे कहना कठिन इसे,
फ़िरदौस जाने वाले कह गए जिसे!!!

Thanks for reading.
Copyright@Vindhya Sharma

Saturday, 11 April 2015

मोदी से नाराज़ हूँ

कई बार मन की भावनाओं को भूमिका की आवश्यकता नहीं होती, क्यूँकि कई भाव स्वाभाविक  तरीके से ही व्यक्त हो जाते हैं... बिना किसी स्पष्टीकरण के...ठीक उसी तरह जिस तरह मेरी नाराजगी से भरी हुई यह पंक्ति.


 

मोदी से नाराज़ हूँ

तेरे वाचन से आश्वासन से, दिल होता बड़ा प्रभावित है...
बस प्रसाद अब मिलने को है, रोम रोम आशान्वित है...

दिखता कुछ खास नहीं, पर फिर भी मन ये मान रहा...
अच्छे दिनों की खिचड़ी को, तू धीरे धीरे रांध रहा ...

पर, पैदा की यह क्या उलझन नई...
अब तो मेरी भी भृकुटि तन गई...

जा मुकुट उसके हवाले किया, जो दुश्मन का गुणगान करे...
क्यों, उससे हाथ मिला लिया, जो ना तिरंगे का मान धरे...

अनेक प्रयास-विचार किये, मन को कितने सुझाव दिए...
पर फिर भी बात न जंच रही..
इस अजब निर्णय की कोई भी...
तक़रीर अब न पच रही...

खूब मनन मंथन के बाद, स्वीकार कर रही आज हूँ...
चाहे दलील कुछ रही हो, पर मै मोदी से नाराज़ हूँ||




Copyright-Vindhya Sharma

Thursday, 2 April 2015

मन

मन मानना ही नहीं चाहता कभी दिमाग की बात, थामना ही नहीं चाहता अपनी उड़ान को, यह नटखट मन क्या कुछ करने को नहीं मचलता| सदा ही जवान और मस्तमौला रहने वाला यह मन शायद कभी उम्रदराज़ भी नहीं होता| ऐसा लगता है कि जैसे अपने डर को ठेंगा सा दिखलाता हुआ यह, आज भी, अपनी उड़ान कम करने को कतई तैयार नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह अठ्ठारह वर्ष पूर्व लिखी इन पंक्तियों से प्रतीत होता है कि मन की चंचलता कैसी थी| सपनो कि सुन्दर सी दुनिया में विचरते इस मन का तर्कों से कोई नाता नहीं|
मन के पंखों को परवाज़ देती मेरी यह पंक्तियाँ किसी सन्दर्भ कि याद तो नहीं दिलाती पर इतना जरूर जताती हैं कि न मन पर वश तब था न ही अभी है, और कहीं न कहीं हम सब का मन ऐसा ही होता है....है न ?

मन


 चंचल पखेरू इस मन के, पकड़ से मेरी परे हैं... सपने इनके सुनहरे, बारहों मास हरे हैं... उड़ें जा पहुँचे वहां, छिपी हैं मेरी चाहते जहाँ ... जो हैं निराधार, पर मन ये बावरा, कर देता इन्हे साकार... मन ये मरीचिका है, इसका मुझे पता है...

 पर उड़ाने मन कि ये बेहद, लगती हैं बड़ी सुखद... डर है तो बस यही, कि मन ये मेरा कहीं... हो न जाये निर्बल, अंततः गिर न जाये, मुहं के बल||






Copyright - Vindhya Sharma
Sketch courtesy - Cartoonzy

Wednesday, 25 March 2015

My Humble Tribute to Shaheed Hemraj




शहीद भगत सिंह व उनके साथियों के साथ, आज याद करें उस वीर जवान हेमराज को भी जिसने पिछले ही बरस वतन के लिए अपना शीश कटा दिया पर झुकाया नहीं| पाकिस्तानी सेना ने इस वीर का सिर धड़ से अलग करके जहाँ अपने कायर व कमजोर होने का सबूत दिया वहीँ इस वीर सपूत ने, अपना सिर कटने से ठीक पहले, "भारत माता की जय" का जयकारा लगाकर भारत माता का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया|

कई बार सोचती हूँ कि आखिर किस मिटटी के बने होते हैं यह वीर और आखिर चलता क्या है उनके मन में?

शहीद हेमराज की शहादत के कुछ माह बाद, एक दिन, बेटे ने स्कूल में होने वाले "फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन" (fancy dress competition) के लिए जब हेमराज का रूप लिया और 'भारत माता कि जय' का नारा लगाया तो शायद वीर हेमराज के हृदय की आवाज़ और रगों के खौलते रक्त ने इन पंक्तियों का रूप ले लिया|  इस वीर के मन का मंथन करने का प्रयास करते हुए मेरी यह पंक्तियाँ समर्पित कर रही हूँ उन तमाम देशभक्तों को, जो कल भगत सिंह व आज हेमराज कि भांति देश के लिए अपना सिर कटाने को सदा तैयार रहते हैं पर इसे झुकाना, न इन्हे मंजूर था न है !!

शत शत नमन करती मेरी यह पंक्तियाँ...


                                                भारत माता की जय .....भारत माता की जय






भारत माता की जय .....भारत माता की जय 
गूंजा करता सदा यही माता मेरे कर्णो में...

रग-रग तूने सींची माता पग-पग तुझसे संवरा है,
हर कण तेरा पावन माता, हर कण की है तू विधाता ....

सौगंध तेरी न रुकने दूंगा, तेरे आँचल की सब लहरों को...
शपथ मुझे सीने पर लूंगा दुश्मन के सब कहरों को ...

तुझपर मरकर मिट-मिट जाना, चाहूँ सारे जन्मों में...
 देशभक्ति का लहू खौलता माता मेरी धरणो में ....

आँख उठा देखा जिसने, लिखा जायेगा मरणों में...
तेरी रक्षा करते जीना-मरना, आता मेरे धर्मो में...

ऐसे कई शीश न्यौछावर...ऐसे कई शीश न्यौछावर...
माता तेरे चरणो में ...माता तेरे चरणो में!!

Copyright-Vindhya Sharma

Thursday, 5 March 2015

जन्म लेना ही है साहस

 8 मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के निकट आते ही विभिन्न समारोहों का आयोजन व उनमे महिलाओं का महिमामंडन, वर्षों से चली आ रही एक सुनियोजित सी परंपरा है| उन्नति पथ पर अपनी राह संवारते आगे बढ़ती महिला इन आयोजनों को, मुड़कर देखती जरूर है किन्तु मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाती है| उसकी यह मुस्कराहट इस महिमामंडन के लिए होती है| हर क्षेत्र के विभिन्न श्रेष्ठ पदों को संभाल-संवार रही महिलायें, आज भी गर्व से तो कभी गंभीरता से, अपने स्त्री जन्म के विषय में सोचती जरूर हैं| अपने एक ही जीवन में, अनेक सीमाओं के अंतर्गत, कितनी ही भूमिकाओं का निर्वहन कुशलता व प्रसन्नतापूर्वक कर रही है, आज भी महिला|

२० वर्ष पूर्व की याद मन को ताजा सा स्पर्श देती है, जब कॉलेजों में, सत्ताइसवें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में, "नारी होने का अहसास" विषय पर विभिन्न संगोष्ठियों व कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा था व छात्र छात्राओं से भी विचार आमंत्रित किये जा रहे थे| अपनी मित्र के साथ, इस दिए गए विषय के दर्शन को सहानुभूति, नाराजगी, प्रश्नचिन्ह तो कभी गर्व के भावों के साथ विमर्श करते हुए कुछ पंक्तियाँ स्वतः ही कागज़ पर उतर आईं| इन पंक्तियों से जुडी एक सुखद स्मृति यह भी है कि जब मैने इन्हे समारोह में  भिजवाया तो कई जानी मानी कवियत्रियों की कविताओं से सुसज्जित एक पुस्तक में इन्हे , प्रकाशन हेतु स्थान दिया गया|
'एक जीवन में अनेक जन्मों का संगम", यह सत्य मेरी लिखी इन बरसों पुरानी पंक्तियों में आज भी, उतनी ही  सच्चाई से धड़क रहा है न ..






जन्म लेना ही है साहस


बालिका एक,
बेचैनी को मन ही में सहती है...
शहनाइयों के शोर में,
खुद से यह कहती है...

'है मौसम परेशां सा,
लगे अब जीवन मेहमां सा,
परसों ही दुनिया में आये हैं,
कल ही तो थोड़ा मुस्काये हैं...

और आज....
एक कहानी खत्म..

कल दूसरा मेरा जनम है,
निभानी विवाह की रसम है||'

और दुनिया,
वैसी ही रहती है...

पर,
बालिका वही,
शादी बाद, बन औरत यह कहती है...

'है आभास मुझे खुद के बदलने का..
फूलों के महकने और चिड़ियों के चहकने का...
सत्य ही किसी का ये कथन है...
ख़ुशी और डर का ये संगम है...
कल तीसरा मेरा जनम है
देना किसी को नया जीवन है||'

पूछते हमसे जो हैं नारी होने का एहसास...
कहो उन्हें, यह रूप ले जन्मना ही है साहस

कई जन्मों- उपजन्मों का नाम स्त्री है,
दुर्गा तो कभी ये कहलाई सती है...

एक जन्म माँ से लिया,
जन्म दूजा, विवाह ने दिया...
बन माँ स्वयं, पाया जन्म तीजा ....

एक जीवन में कई जन्मों के लक्षण 
सत्य है, होना स्त्री है विलक्षण !!
होना स्त्री है विलक्षण !!





Thanks for reading my words. 

Thursday, 19 February 2015

वक्त

अपने किसी खास का दुःख हमको भी कितना दुखी कर जाता है न...और उसके दुःख को किसी भी तरह कम न कर पाने की वह विवशता और भी दुखदायी होती है| शायद हर व्यक्ति अपने तरीके से इस स्थिति को संभालता या सामना करता है|
मैं भी अपनी उस ख़ास को धीरज से अच्छे वक्त का इन्तजार करने की सलाह देने के आलावा कुछ नहीं कर सकी थी| पर आज संतुष्ट हूँ, जब देखती हूँ कि उसके सब्र को वक्त ने अपनी कसौटी से परख कर खरा बना दिया| आज उसके चेहरे पर खिलती हंसी वक्त कि दी ख़ुशी है|
मुझे याद है, सही सत्रह वर्ष पूर्व, कितनी आसानी से मैने उसे सही वक्त का इंतज़ार करने कि सलाह दे दी थी, कुछ इस तरह.....




आंसू आँखों का,
मरहम ज़ख्मों का,
ओठों का गुलाब वक्त है...

उम्र दोस्ती की,
बुनियाद रिश्तों की,
दिलों की चाहत वक्त है...

गुजरता लम्हा,
धड़कती धड़कन,
पहर रात का वक्त है...

वो तेरी सिसकी,
ये तेरी चुप्पी,
देखता सबकुछ वक्त है...

सुन 'मनु-संतान',
तुझसे भी बलवान,
पहचान तेरी हर ,
वक्त है...

वक्त है महान,
देगा तुझे मुस्कान,
पर मांगता कुछ.....
वक्त है !!



Thank you for reading.
 Pls read my words, in rythem, on woman- chote chote sukh,  Astitv,  mahila suraksha
Copyright-Vindhya Sharma

Thursday, 12 February 2015

जरूरी

अपनी अपेक्षाओं, प्राथमिकताओं की अलग ही स्वप्निल सी दुनिया बनाकर, उसमे विचरण करती आज की युवा पीढ़ी में राजनीतीक दर्शन के प्रति अचानक ही उत्सुकता सी पैदा हुई है| निसंदेह राजनीति के पटल पर अकस्मात् ही उभरे दो व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका है इसमें|
प्रसन्नता की बात है की दोनों की ही दृष्टि व् दृष्टिकोण अपने अपने तरीके से लुभाता है लोगों को|  यही तो वजह है जिसके कारण दोनों को जनता का समर्थन हाथ खोलकर और विश्वास आँख बंद करके मिला, और इतना मिला की संख्याएँ ठिठक गईं| समान मंजिल को तकती, दो धारायें बह निकली हैं, भले ही राहें भिन्न हैं, पर सब जानते हैं कि समागम का स्थान तो एक ही है|
तीक्ष्ण निगाहों में आशाएँ जागी हैं अनेक...
आज संपूर्ण राजनीती में छाए हुए इन दोनों नव विश्वास के सूत्रधारों को, जिन्हे परिचय की आवश्यकता नहीं है, चेताते हुए, समर्पित कर रही हुँ अपनी यह पंक्ति ...


जरूरी 



स्फुटित स्मृत भोर में, चिंतन का है तम जरुरी,
तपते विशद उदभास का, अब होना है मद्धम जरूरी...

खिलती कलियों के उपवन में, जैसे ढलता सा यौवन जरूरी,
वैसे ठंडी सौंधी बयार चली तो, है आंधी भी प्रचंड जरूरी...

'स्व' प्रदर्शन प्रचार में, कुछ नीति हों प्रछन्न जरूरी,
विजय मद अट्हास का, कर गंभीर सा मंथन जरूरी...

जो दी पताका लहराती तो, रखे पैनी वो चितवन जरूरी,
उद्दंड, उद्वेग उदगार में, अब कर विनय उत्पन्न जरूरी...

तन जरूरी, मन जरूरी, जीवन का हर रंग जरूरी,
नव उज्जवल आगाज़ से, हर वचन हो संपन्न जरूरी |||


Thank you for reading.
To read my Words, in rythem, on politics pls go. Mahila surksha, Kejri fir se
Copyright-Vindhya Sharma