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Sunday, 1 February 2015

केजरीवाल फिर से



                                               केजरीवाल फिर से

आओ लोगों मिलकर चलें, तो दिन हमारे आएंगे...
भाषण के दिन बीत गए अब काम हम करवाएंगे ...

अड़सठ वर्षों  में कितने चेहरे हमने परखे थे...
हमसा न था कोई, सारे ऊंचे पहुंचे अमले थे..

चलो पांच वर्ष दे देखें  उसको, जो हममे से उठ खड़ा हुआ...
उनचास दिन में दिखा गया, है निस्वार्थ भाव से धुला हुआ...

वायदे जो भाषण के बोल रहे, सपने जो अब तक अनमोल रहे..
पूरे वो हो जायेंगे ये विश्वास जगाया है...
'संभव है यह', मिथ्या बोलों से नहीं कर्मों से करके दिखाया है...

हर आम आदमी ने खुद को उससे जोड़ा है...
एक नहीं अनेक उसके कामों का ब्यौरा है..

भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने चालू कर दी हेल्पलाइन...
पानी देखो मुफ्त हुआ,  प्रशासन कैसा चुस्त हुआ...

बिजली के आधे दाम हुए, बंद लाल नील निशान हुए..
कच्ची बस्तियों को भी आराम हुआ, जब सीवर का सारा काम हुआ....

आम आदमी का सम्मान किया, देखो ऑटोरिक्शा आम किया...
हज़ारों परमिट और बंटे, हफ्तावसूली के दिन छंटे...

निहाल हुई दिल्ली की कौम, जब ऑडिट हुई डिस्कॉम डिस्कॉम...
करोड़ रुपया ईनाम दिया, शहीद को ऐसा मान दिया...

उनचास दिन का लेखा जोखा भी उसकी पहचान है...
सरल, शिक्षित, सुदृढ़ कजरी, अब हमारा अभिमान है...

एक और मौका उसको देंगे, उस इक गलती को भुलायेंगे...
वोट दे  केजरी को, दिल्ली में हम लाएंगे.. 

 बना CM उसे हम सरकार चलाएंगे...
 अब हम सब  सरकार चलाएंगे...
Thanks for reading.
To read my Words, in rythem, on politics pls go. Mahila suraksha, Jaroori 
Copyright-Vindhya Sharma

तीन लकीरें

हमारी संस्कृति, हमारे रिवाज़, मध्यम वर्गीय परिवार की बड़ी बेटी को उम्र से कुछ पहले ही बड़ा कर देते हैं | सत्रह से अठारह की देहलीज़ पर पड़ते उसके कदम, पिता को चौखट के बाहर खड़े हो, टोह लेने की सूचना देते हैं| सही समय पर उचित वर की आहट पा लेने को आतुर पिता को देखती, बेटी की व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है|

कुछ ऐसी ही विचित्रता को मैंने अपनी पंक्तियों में पिरोने का प्रयास किया था, जब उस दौर का स्वयं एहसास किया था | वर को खोजते भटकते अपने पिता को चिंतामुक्त करने की उत्कंठा आज भी याद है मुझे |


लगभग २० वर्ष पूर्व कुछ छुआ था मन को, इस तरह....







                                              तीन लकीरें



 पिता, माथे से तुम्हारे ये तीन लकीरें.... कैसे हटाऊँ ?

क्या वक्त रोक दूँ...
मुमकिन नहीं है....

क्या बदल दूँ समाज... 
ये रीति, ये रिवाज़ ...
वह कठिन है...

क्या तोड़ दूँ कायदे,
ये नियम ये वायदे ...
हाँ की तुमसे आशा नहीं है...

तो... क्या जहाँ छोड़ दूँ...
पर बेटी तुम्हारी बुजदिल नहीं है| 

तुम जो सुझाओ, वही कर जाऊं,
 कहो न पिता... माथे से तुम्हारे...
 ये तीन लकीरें, कैसे हटाऊँ?




Thanks for reading.

Pls my words, in rythem, on woman empowermnt, safety- mahila surksha
Pls read my words, in rythem, on Self respect- Astitav, chote chote sukh
Copyright-Vindhya Sharma