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Wednesday, 7 October 2015

चुनावी मौसम (1)

एक समाचार पर नज़र जाते ही मन को बड़ी पीड़ा हुई आज| देश के महत्वपूर्ण प्रदेश में चुनाव होने को हैं| हर बार की तरह चुनाव के पूर्व वायदों से एक स्वप्निल सा वातावरण, राजनीतिक दलों द्वारा बनाया जाता रहा है, एक मायाजाल सा फैलाया जाता रहा है, तो आरोपों का पिटारा भी खोला जाता रहा है| पर हमारे ही एक नेता द्वारा यू.एन.ओ. को पत्र लिखकर, अपने ही देश में हस्तक्षेप की मांग करना बहुत ही अलग हो गया इस बार| बदलाव इस रूप में, निसंदेह ही सुखद नहीं है|

मुझे याद हो आई बाईस बरस पूर्व की वह बात, जब ऐसे ही चुनावी मौसम में किसी दल के नेता ने, चुनाव प्रचार के दौरान सूखाग्रस्त क्षेत्र में बारिश करने का वायदा कर डाला था| हँसते हुए मन से निकलकर कुछ पंक्तियाँ कागज़ पर मुस्कुरा गई थीं तब| जब तुलना की तो अतिश्योक्ति इस पुराने  रूप में, आज बुरी नहीं लगी|
सन्दर्भ तो भिन्न है परन्तु तनाव व पीड़ा के कष्ट में इन पंक्तियों का स्मरण आज भी मुस्कान दे गया तो सोचा क्यों न यह मुस्कान आपसे भी बाँट लूँ| उस वक्त ऐसे ही चुनावों के दौरान बने वातावरण में  मेरे 17-18 वर्षीय युवा मन ने अभिव्यक्त की थीं, मेरी यह पंक्ति...







चुनावी मौसम


पधारे नेताजी गांव अचानक ,
खबर यूँ फैली चारों ओर  ...
लगी हो जंगल में आग भयानक..

बच्चे, बूढ़े और पठ्ठे,
हुए पंचायत में इकठ्ठे...
बोले..
अब आये हो, क्या चुनाव साथ लाये हो?

अंदर से खिसियाते हुए,
पर ऊपर से मुस्कुराते हुए,
हो नम्रतम नेताजी बोले...
न हमसे कुछ भी छुपाओ,
समस्याएं अपनी हमे बताओ..
धर के उनपर अपना ध्यान,
करेंगे उनका हम समाधान...

बाबा एक बूढ़े बोले,
नल बिन मरते लोग भोले...

दिया नेताजी ने आश्वासन..
नल तो हमे लगवाना ही है...
यह तो कोई समस्या नहीं है|

हुआ पीछे से एक प्रहार,
सड़क नहीं है यहाँ सरकार|

बोले, बन रही सड़क भी भई,
कोई समस्या बताओ हमे नई|

बालक एक बोला ज्ञानी,
बरसता नहीं है यहाँ पानी...

पुलकित हो नेताजी चहके,
'औ' बाग़ बाग़ होकर महके,
बोले वे भरकर स्वांग ....
करेंगे पूरी तुम्हारी मांग...

मेघ भी हम बरसाएंगे,
जो चाहोगे करवाएंगे,
करेंगे हम तुम्हारा उद्धार..
पर,
शर्त करो हमारी स्वीकार...
कि, वोट तुम हमको ही दोगे
वरना मांगे अपनी खोवोगे |

ले लिया जब पक्का आश्वासन...
तो, डर उनके सब सफा हो गए...
ले विदा और हाथ हिला...
नेताजी बैठ कार में हवा हो गए !!